02-02-76   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन

भक्तों और पाण्डवों का पोतामेल

भक्तों को भक्ति का फल देने वाले भगवान् और पाण्डवों को विश्व-परिवर्तन अर्थ शक्ति, प्रेम और सहयोग देने वाले रूहानी बाप शिव बोले:-

आज बाप-दादा अपने तीन प्रकार के बच्चों का पोतामेल देख रहे थे। तीन प्रकार कौन-से? एक -- मुख-वंशावली ब्राह्मण जो बाप-दादा के साथ-साथ नयी दुनिया की स्थापना के कार्य में सहयोगी हैं। दूसरेõ बाप-दादा के, ब्राह्मणों के सुमिरण में व पुकारने में सदा मस्त रहने वाले भक्त। तीसरे - पुरानी दुनिया के परिवर्तन करने अर्थ निमित्त बने हुए यादव। इन तीनों के सम्बन्ध से स्थापना का कार्य सम्पन्न होना है। इसलिये तीनों के कार्य का पोतामेल देख रहे थे। तो क्या देखा? कार्य-अर्थ निमित्त बने हुए तीनों प्रकार के बच्चे अपने-अपने कार्य में लगे हुए तो ज़रूर है लेकिन तीनों ही कार्यकर्त्ताओं के कार्य में जब तक तीव्रता में अति नहीं हुई है तब तक अन्त नहीं हो सकता। क्योंकि अन्त की निशानी अति है। तीनों में ही कार्य का फोर्स है, लेकिन फुल फोर्स (Full Force) ही कार्य के कोर्स को समाप्त करेगा। 

भक्तों के पोतामेल में भक्ति के अल्पकाल का फल जो भक्तों को प्राप्त होता है उसमें देखा कि 75% भक्त सिर्फ अपने नाम, मान और शान प्रति स्वार्थ स्वरूप के भक्त हैं। इसलिये उनके कर्म के फल का खाता समाप्त हुआ पड़ा है। बाप को फल देने की आवश्यकता नहीं। बाकी 25% भक्त नम्बरवार लगन प्रमाण भक्ति कर रहे हैं। उनकी भक्ति का फल इसी पुरानी दुनिया में प्राप्त होना है क्योंकि भक्ति का खाता अब आधा कल्प के लिए समाप्त होना है। उसकी गतिविधि क्या देखी कि भक्तों को भी अपनी भक्ति का फल - अभी-अभी किया, अभी-अभी मिला। अर्थात् अल्पकाल की लगन का फल अभी ही अल्पकाल में प्राप्त हो जाता है, भविष्य जमा नहीं होता। भक्तों की प्राप्ति का रूप ऐसे है कि जैसे बारिश के मौसम में चींटियों को पंख लग जाते हैं और वे बहुत खुशी में उड़ने लग जाती हैं। लेकिन वह अल्पकाल की उड़ान उसी सीज़न (Season) में ही उनको समाप्त कर देती है। वहाँ ही प्राप्ति और वहाँ ही समाप्ति। वैसे ही अब के भक्त अर्थात् कलियुगी तमोप्रधान भक्त अल्पकाल के फल की प्राप्ति में खुश हो जाने वाले हैं। इसलिये उनके फल की प्राप्ति का कार्य ड्रामा अनुसार जैसे समाप्त हुआ ही पड़ा है। सिर्फ 5% प्राप्ति का कार्य अब रहा हुआ है, जो अब अति अर्थात् फुल फोर्स से चिल्लायेंगे। उसमें भी विशेष शक्तियों को पुकारेंगे कि - ‘‘वरदान दो, शक्ति दो, साहस और हिम्मत दो।’’ अभी यह अति में जाकर फिर समाप्त होने वाला है। तो भक्तों के पोतामेल का रजिस्टर समाप्त हुआ ही पड़ा है। जो थोड़ा-बहुत रहा है वह अभी-अभी कर्म और अभी-अभी फल के रूप में समाप्त हो जावेगा। यह था भक्तों का समाचार। 

दूसरा - यादव-सेना का समाचार। उनके पोतामेल में क्या देखा? हर कदम पर उनके क्वेश्चन-मार्क्स (?) देखे। स्पीड (Speed) तेज करने के बहुत चात्रक देखे। लेकिन जितना स्पीड को तेज करते, उतना ही क्वेश्चन-मार्क की दीवार बार-बार आने के कारण स्पीड (Speed) को तीव्र नहीं कर पाते। क्वेश्चन मार्क्स कौन-से? एक तो आरम्भ कौन करे - मैं करूँ या वह करे? दूसरा - अब करें या कब करें? तीसरा- इसकी रिजल्ट क्या होगी? कभी क्रोध-अग्नि प्रज्वलित होती, कभी फिर ‘क्या होगा’ का संकल्प रूपी पानी छींटे समान अग्नि शीतल कर देता है। चौथा क्वेश्चन (Question) यह सब कराने वाला कौन, प्रेरक कौन? इसमें कन्फ्यूज़ (Confuse) हो जाते। उनकी गतिविधि क्या देखी? अपने आप को ही नहीं समझ रहे हैं। होश और जोश - इसी दुविधा में हैं। इसलिये स्वयं से ही परेशान हो जाते हैं। एकान्तवासी बनना चाहते, लेकिन बुद्धि एकाग्र नहीं होती। इसलिये बार-बार जोश में आ जाते। बहुत तेजी से प्लैन बनाते, फुल तैयारी भी कर लेते, समय, सेना, शस्त्र और स्थान सब सेट कर लेते हैं, ऐसे ही समझते कि अभी हुआ कि हुआ। बहुत फास्ट (Fast) तैयारी में रहते। लेकिन लास्ट प्रैक्टिकल के समय में कन्फ्यूज्ड (Confused) रूपी सिग्नल (Signal) लग जाता। इसलिये उनकी तैयारी में सिर्फ प्रेरक की प्रेरणा के एक सेकेण्ड का फर्क है। इन्तज़ाम है लेकिन उस सेकेण्ड की प्रेरणा के इन्तज़ार में हैं। उनकी गतिविधि सेकेण्ड तक पहुँची है। इन्तज़ाम समाप्त कर इन्तज़ार कर रहे हैं। तो उनका पोतामेल सम्पन्न तैयारियों का देखा। अब सिर्फ एक कार्य में लगे हुए हैं - रिफाइन है लेकिन अपने विवेक द्वारा अपनी तैयारी को फाइनल कर रहे हैं। फाइनल करने की एक फाइल अभी रही हुई है। यह था यादवों का समाचार। अभी अपना सुनने की इच्छा है? 

प्रेरणा लेने वाले तो तैयार हैं लेकिन प्रेरणा देने वालों का क्या हाल है? वैसे कहावत है - ‘देने वाला दे, लेने वाला थक जाये।’ लेकिन इस बात में लेने वाले, न मिलने के कारण थक रहे हैं। लेने वाले लेने के लिए तैयार हैं और देने वाले स्वयं में ही अब तक लगे हुये हैं। तो ब्रह्मा मुखवंशावली ब्राह्मणों का पोतामेल क्या हुआ है? वो जानते होया सुनायें? ब्राह्मणों के रजिस्टर में विशेषता क्या देखी? विश्व-परिवर्तन व विश्व-कल्याण की शुभ भावना मैजॉरिटी (Majority) के पास इमर्ज (Emerge) है, लेकिन चलते-चलते जैसे यादवों की स्पीड क्वेश्चन-मार्क्स (?) के कारण तीव्र नहीं होती, ऐसे ब्राह्मणों की श्रेष्ठ भावना का प्रत्यक्ष फल प्राप्त होने वाला ही होता है तो बीच में कोई-न-कोई रॉयल (Royal) रूप की कामना शुभ कामना को मर्ज (Merge) कर देती है। तो ब्राह्मणों की गतिविधि में शुभ भावना और रॉयल (Royal) रूप की कामना - इन दोनों की कलाबाज़ी चल रही है। जैसे पके हुये फल को पंछी समाप्त कर देते हैं वैसे भावना के प्राप्त हुये फल को कामना रूपी पंछी समाप्त कर देता है। तो ब्राह्मणों के परिवर्तन करने की विधि सिद्धि-स्वरूप न बनने का कारण भावना बदल ‘कामना’ हो जाना है। इसलिये पुरूषार्थ ज्वाला रूप में नहीं होता है। ब्राह्मणों का ज्वाला-रूप विनाशज्वाला को प्रज्वलित करेगा। इसलिये ब्राह्मणों के पोतामेल में अब लास्ट सो फास्ट (Last So Fast) पुरूषार्थ ज्वाला-रूप का ही रहा हुआ है। यादवों का कार्य जैसे सम्पन्न हुआ ही पड़ा है, पाण्डवों का कार्य सम्पन्न होने वाला है। पाण्डवों के कारण यादव रूके हुए हैं। पाण्डवों की श्रेष्ठ शान, रूहानी शान की स्थिति यादवों के परेशानी वाली परिस्थिति को समाप्त करेगी। तो अपनी शान से परेशान आत्माओं को शान्ति और चैन का वरदान दो। समझा? तीनों का पोतामेल सुना? अच्छा! 

ऐसे ज्वाला-स्वरूप सर्व विनाशी कामनाओं को श्रेष्ठ और शुभ भावना में परिवर्तन करने वाले, भक्तों के अल्पकाल के अन्तिम फल महादानी, वरदानी रूप में देने वाले दाता और वरदाता बाप समान सदा देने वाले और सर्व की मनोकामनाओं को सम्पन्न करने वाले सम्पूर्ण फरिश्ता आत्माओं को बाप-दादा का याद-प्यार और नमस्ते।